चांद पर बनेगा परमाणु बेस… अमेरिका- रूस और चीन के बीच अनोखी स्पेस रेस
स्पेस में नई जंग छिड़ गई, यह रेस चांद पर पहुंचने की नहीं बल्कि वहां न्यूक्लियर बेस स्थापित करने की है. एक तरफ अमेरिका है और दूसरी तरफ रूस और चीन. दरअसल चांद पर रहने के लिए एनर्जी की जरूरत है, वहां की रात लंबी होने की वजह से ही स्पेस एजेंसियां चाहती हैं कि चांद पर जल्द से जल्द परमाणु बेस स्थापित कर लिया जाए.
चांद को जीतने के लिए अनोखी स्पेस रेस हो रही है. ये चांद पर जाने की नहीं, बल्कि वहां परमाणु बेस बनाने की है. इस रेस में अमेरिका के खिलाफ रूस और चीन मिलकर दौड़ रहे हैं. कौन चांद पर पहले परमाणु रिएक्टर लगाएगा, इसे लेकर होड़ मची है. दोनों गुटों ने चंद्रमा पर परमाणु पावर सप्लाई के लिए डेडलाइन तय कर दी है. काम तेजी से चल रहा है.
चांद को जीतने के लिए अनोखी स्पेस रेस हो रही है. ये चांद पर जाने की नहीं, बल्कि वहां परमाणु बेस बनाने की है. इस रेस में अमेरिका के खिलाफ रूस और चीन मिलकर दौड़ रहे हैं. कौन चांद पर पहले परमाणु रिएक्टर लगाएगा, इसे लेकर होड़ मची है. दोनों गुटों ने चंद्रमा पर परमाणु पावर सप्लाई के लिए डेडलाइन तय कर दी है. काम तेजी से चल रहा है.
1960 के दशक में दुनिया ने पहली बार चांद तक पहुंचने की रेस देखी थी. एक तरफ अमेरिका था और दूसरी तरफ सोवियत संघ. इस रेस में जीत अमेरिका की हुई. 20 जुलाई 1969 को नील आर्मस्ट्रॉन्ग के कदम चांद की सतह पर पड़े और इतिहास बदल गया. लेकिन अब, 55 साल बाद, एक और स्पेस रेस शुरू हो चुकी है, मंज़िल वही चमकता चांद है. मगर इस बार लड़ाई सिर्फ झंडा गाड़ने की नहीं बल्कि वहां पहला परमाणु रिएक्टर बनाने की है. जो देश सबसे पहले चांद पर परमाणु रिएक्टर बनाएगा, वो ना सिर्फ वहां इंसानी बस्ती बसा सकता है बल्कि उसके पास एक लगातार ऊर्जा का स्रोत भी होगा. ऐसा स्रोत जो चांद के अंधेरे और जमा देने वाली ठंड में रोशनी और गर्मी दोनों देगा और ऐसा भी हो सकता है कि वो देश चांद के उस इलाके को Keep Out Zone भी घोषित कर दे, जिसका मतलब है बाकी देशों को वहां से दूर रहने की चेतावनी.
नासा ने तेज कर दिया प्लान
नासा ने चांद पर परमाणु रिएक्टर लगाने का प्लान तेज कर दिया है. वैज्ञानिकों को स्पष्ट आदेश दिया गया है कि 2030 तक 100 किलोवॉट का परमाणु रिएक्टर चांद की सतह पर पहुंच जाना चाहिए. नासा की इस जल्दबाजी का मुख्य कारण है रूस और चीन का चांद के लिए गठबंधन दरअसल 2021 में दोनों देशों ने International Lunar Research Station बनाने के लिए समझौता किया था. प्लान के मुताबिक 2033 से 2035 के बीच चांद पर परमाणु रिएक्टर लगाया जाएगा. इस साल मई में दोनों एजेंसियों रॉसकॉसमॉस और CNSA ने चांद पर लूनर पावर स्टेशन बनाने का औपचारिक समझौता भी किया.
परमाणु बेस बनाने की क्यों छिड़ी जंग?
अब ये भी समझ लीजिए कि आखिर चांद पर न्यूक्लियर रिएक्टर बनाने के लिए इन महाशक्तियों के बीच जंग क्यों छिड़ी हुई है. चांद पर एक दिन, पृथ्वी के 14 दिनों के बराबर लंबा होता है और एक रात भी उतनी ही लंबी होती है. यानि चांद पर दो हफ्ते रोशनी और दो हफ्ते अंधेरा रहता है, वो भी जमा देने वाली ठंड में तो सिर्फ सोलर पैनल और बैटरी पर निर्भर रहकर वहां रहना असंभव है इसलिए वहां परमाणु रिएक्टर बनाने का मिशन चल रहा है जो चांद पर चौबीसों घंटे बिजली दे सके. इसके लिए अमेरिका जी जान से जुटा है तो रूस और चीन भी जोर शोर से लगे हैं, लेकिन तकनीकी रूप से ये इतना आसान नहीं है. NASA का Starship Lunar Lander अभी टेस्टिंग फेज में है. कई टेक्नोलॉजीज़ अभी तक आज़माई ही नहीं गई हैं.
रूस के वैज्ञानिकों का बड़ा दावा
दूसरी तरफ रूसी के वैज्ञानिकों का दावा है कि उनके पास तकनीक और अनुभव दोनों मामलों में बढ़त है. जबकि चीन अपनी स्पेस तकनीd को अक्सर गुप्त रखता है लेकिन चांद पर न्यूक्लियर रिएक्टर लगाने के लिए उसे ये तकनीक रूस से साझा करनी पड़ेगी. 60 के दशक में अमेरिका ने सोवियत संघ को पछाड़ दिया था तो क्या इस बार वो रूस और चीन के गठबंधन के मात दे पाएगा. परिणाम चाहे जो हो लेकिन दूसरी स्पेस रेस शुरू हो चुकी है और इसकी फिनिशिंग लाइन चमकते चांद की पथरीली सतह पर है.
कोई टिप्पणी नहीं